मैं आमतौर पर कभी क्षेत्रवाद नहीं करती लेकिन इस बार आपने मुझे आपके व्यवहार के कारण क्षेत्रवाद करने पर विवश किया है।
प्रिय मीडिया,
मैं हूँ बिहार की टॉपर कल्पना। जब नीट के पेपर में मैं टॉप की थी तब मैं आपके लिए शायद बहुत मेहनती और बुद्धिमान छात्रा थी और मुझे लगा कि आप मुझें भी बाकी प्रवेश परीक्षा के टॉपरों के समान ही सम्मान और तव्वजों देंगे पर मेरे भ्रम का यह चश्मा जल्द ही कमजोर कांच का चश्मा साबित हुआ और जल्द ही यह चश्मा टूट भी गया। फिर आया वो दिन जिसका आप सबसे ज्यादा बेसब्री से इंतजार करते है(बिहार बोर्ड का रिजल्ट) क्योंकि आपकी नजरों में बाकी बोर्ड के छात्र मेहनत से पास होते हैं और हम बिहार बोर्ड के छात्र फर्जी तरीके से पास होते है। चंद छात्रों को परीक्षा में चोरी करते देख आप यह मान लेते है कि यहाँ का तो हर छात्र ही ऐसे पास होता है पर माफ कीजिए आपका जनरल नॉलेज बढ़ाने के लिए मैं आपको कुछ और बातों से रूबरू कराना चाहती हूँ- हम लोग भी बाकी बच्चों की तरह 9 घंटे की पढ़ाई करते हैं। हम लोग भी बाकी छात्रों की तरह कोचिंग करते है (पर आपकी नजरों में बाकी बोर्ड के छात्र अगर एन्ट्रेस की कोचिंग कर बोर्ड में पास हो तो वे रेगुलर स्टूडेंट्स हो जाते और हम फर्जी)। हमारे घरवालें भी हमारी पढ़ाई पर ध्यान देते है और रिजल्ट में हमारी मेहनत की छलक देखना चाहते हैं। हमारे भी सरकारी स्कूलों के हालात देश के बाकी सरकारी स्कूलों की तरह हैं (पर आपकी नजर में बिहार के अलावा देश के सारे सरकारी स्कूल शतप्रतिशत शिक्षक और छात्र उपस्थिति का सर्वोच्च नमूना है)। माना हमारे यहाँ अच्छे कोचिंग सेंटर नहीं इसीलिए हम बाहर रहकर ऐंट्रेंस के साथ बोर्ड परीक्षा की तैयारी करते है लेकिन फिर भेदभाव हमारे साथ ही क्यों? क्या हमारे साथ दिल्ली और कोटा में कोचिंग करने वाले बाकी बोर्ड के छात्र रेगुलर होते हैं? नहीं, न फिर आप उनकों देखने के लिए अलग चश्मा और हमें देखने के लिए अलग चश्मा क्यों रखें हैं?
मैं अब और ज्यादा नहीं बोलूंगी, नहीं तो क्या पता मुझसे तथाकथित कुछ क्रांतिकारियों की श्रेणी में रख मेरे साथ भी मानहानि का खेल खेलने लगें। दरसल असल बात तो यह है कि आप लोग आज भी पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था का गौरव रहे नालंदा की जमीन बिहार को पिछड़ा ही देखना चाहते है और जब वह आगे बढ़ने का प्रयास करता है तो उसकी खामियां गिनाकर खुद को उच्च और उसको तुच्छ साबित करने का प्रयास करतें है।
अफसोस तो दरअसल तब सबसे ज्यादा होता है जब आपकी इस गैंग में खुद बिहार निवासी, बिहार बोर्ड के विधार्थी शामिल होते है। अपनी डिग्री को बचाने के लिए दुहाई देते है कि हमारे जमाने में तो बहुत कठिन पेपर आता था और बहुत कठाई भी होती थी लेकिन आजकल...। और बस इसी 'आजकल' शब्द ने ही आधे से ज्यादा मेहनत करने वाले छात्रों की बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट पर सवाल खड़े कर दिये है।
बाकी आप लोगों को बहुत धन्यवाद की आप लोग हमकों कम से कम इतनी तवज्जो तो देते है फिर चाहे भले ही वह तवज्जो एक विशेष तरह का चश्मा लगाकर दिया जाता हो।
आपकी बिहार टॉपर
कल्पना कुमारी
कल्पना कुमारी
(यह पत्र कल्पना द्वारा नहीं लिखा गया है, बिहार की निवासी होने के कारण और कल्पना जैसे हजारों बिहार बोर्ड के छात्रों की परेशानी समझते हुए, मेरे (सुप्रिया सिंह) द्वारा लिखा गया यह पत्र।

एक सराहनीय प्रयास आपके द्वारा सुप्रिया जी।
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