Saturday, 1 August 2020

कमरा साथी

कमरा....

क्या था वो
एक छोटा सा खाली कमरा ही तो था
जहां सिर्फ मैं और मेरे ख्वाब रहते 
जहां मैं और मेरे सवाल रहते थे 
मेरे बेवकूफी वाले अंदाज रहते थे 
तो मेरी हरकतों पर हसंते सवाल रहते थे 

था क्या वो 
सिर्फ एक कमरा ही तो था

नहीं, वो कमरा नहीं जिंदगी का राज़दार था
था तो छोटा लेकिन बड़ा दिलदार था

था क्या वो 
एक ईंट पत्थर से बना ढांचा

इंसानों की भीड़ मे वे इकलौता साफ दिल अहसास था
सोचने के लिए पूरा का पूरा खाली दिमाग 
क्योंकि वो कमरा नहीं मेरा पहला प्यार था।

Sunday, 24 February 2019

जंगल को बीरसा का इंतज़ार


महाश्वेता देवी जी ने अपनी किताब जंगल के दावेदार में आदिवासी संघर्ष की महागाथा लिखी है। जंगल के दावेदार उपन्यास में जंगल में रहने वाले आदिवासी मुण्डा बीरसा के संघर्ष के जरिए आदिवासियों के संघर्ष का दर्द लिखा गया है।

किताब में बीरसा अपने पिता की जमीन और जगह नागपुर के लिए संघर्ष करता-करता शासन की राजनैतिक हवस का शिकार हो जाता।

जंगल के दावेदार उपन्यास के लिए महाश्वेता देवी को साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' मिला था। किताब पहली बार 1998 में प्रकाशित हुई थी। किताब को खूब सराहा गया। तब हम 20 वीं सदी के अंतिम पड़ाव पर थे ।

साल 2019, तारीख 21 फरवरी, सदी - 21 वीं एक बार फिर से  लाखों आदिवासियों को जंगल-जमीन से बेदखल किया जा रहा है। बदकिस्मती इस बार इन आदिवासियों के पास अपना कोई बीरसा नहीं है। इनके पास बीरसा जैसा भगवान नहीं है। अब इनके पास धूर्तता की चका-चौंध वाली सरकार है।

समय बदलता या यूं कहें कि सदी बदलती है लेकिन कहानी और उसके पात्र जस के तस ही बने रह जाते है ।

Saturday, 9 February 2019

सरस्वती पूजा से बसंत पंचमी तक सफर

आज वसंत पंचमी है लेकिन बचपन से मुझे ये दिन हमेशा से सरस्वती पूजा के नाम से ही याद रहता है। जब छोटे थे तो गांव में बड़का पंडाल में सरस्वती जी का मूर्ति लगाया जाता था और मम्मी पीले रंग का फ्रॉक पहनाकर हमें भेज देती थी। एक बार जब सुबह घर से निकलते थे तो बिना पिटाए शाम को कभी घर नहीं आते थे। (मम्मी बार-बार बुलाती थी और हम जब पंडाल से नहीं आते थे तो पापा मम्मी के आदेश पर हमको अपने तरीके से बुलाकर लाते थे)

बड़े हुए पापा की नौकरी के कारण शहर आना पड़ा। जब शहर में पहला सरस्वती पूजा था तो हमको आज भी याद है हम खूब रोएं थे क्योंकि यहां कोई पंडाल नहीं लगा था और जिस बच्चे ने बचपन से पंडाल में खूब नाचा हो, उसको शहरी सरस्वती पूजा कैसे भाती ?

फिर शुरू होता है स्कूल की सरस्वती पूजा का दौर। स्कूल में इस दिन सभी बच्चो को कुछ पीले रंग का पहन कर आना जरूरी होता था और जिसके पास पीले रंग का कुछ नहीं होता था वो हाथ में पीले रंग का रूमाल बांधकर आता था। हवन के लिए स्कूल को बड़े ही सुंदर ढंग से सजाया जाता था और सरस्वती जी तो उस दिन एकदम दुल्हन समान लगती थी। उस दिन बाकी बच्चों का तो पता नहीं लेकिन मेरा पूरा ध्यान हवन से ज्यादा हलवे की आती खुशबू पर होता था। अगर स्कूल में संबंध अच्छे हो तो एक के बदले दो प्लेट भी हलवा मिलने की पूरी संभावना रहती थी।

स्कूल से निकले यूनिवर्सिटी में पहुंचे। यहां आते-आते सरस्वती पूजा बंसत पंचमी में बदल गई थी। यूनिवर्सिटी में भी बड़े अच्छे से पूजा होती लेकिन स्कूल जैसी नही होती थी।

फिर आता है नौकरी वाला सरस्वती पूजा और अब समय इतना बदल चुका है या यूं कहे कि हम ही इतना बदल चुके है कि जिस पूजा का हम साल भर इंतज़ार करते थे उस पूजा के बारे हमें सोशल मीडिया याद दिला रहा है।

खैर कहा जाता है न कि जब जागो तब सवेरा, बड़े लोगों को बसंत पंचमी और छोटे लोगों को सरस्वती पूजा की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

Friday, 8 June 2018

मीडिया के लिए कल्पना की पाती.


मैं आमतौर पर कभी क्षेत्रवाद नहीं करती लेकिन इस बार आपने मुझे आपके व्यवहार के कारण क्षेत्रवाद करने पर विवश किया है। 

प्रिय मीडिया,

           
मैं हूँ बिहार की टॉपर कल्पना। जब नीट के पेपर में मैं टॉप की थी तब मैं आपके लिए शायद बहुत मेहनती और बुद्धिमान छात्रा थी और मुझे लगा कि आप मुझें भी बाकी प्रवेश परीक्षा के टॉपरों के समान ही सम्मान और तव्वजों देंगे पर मेरे भ्रम का यह चश्मा जल्द ही कमजोर कांच का चश्मा साबित हुआ और जल्द ही यह चश्मा टूट भी गया। फिर आया वो दिन जिसका आप सबसे ज्यादा बेसब्री से इंतजार करते है(बिहार बोर्ड का रिजल्ट) क्योंकि आपकी नजरों में बाकी बोर्ड के छात्र मेहनत से पास होते हैं और हम बिहार बोर्ड के छात्र फर्जी तरीके से पास होते है। चंद छात्रों को परीक्षा में चोरी करते देख आप यह मान लेते है कि यहाँ का तो हर छात्र ही ऐसे पास होता है पर माफ कीजिए आपका जनरल नॉलेज बढ़ाने के लिए मैं आपको कुछ और बातों से रूबरू कराना चाहती हूँ- हम लोग भी बाकी बच्चों की तरह 9 घंटे की पढ़ाई करते हैं। हम लोग भी बाकी छात्रों की तरह कोचिंग करते है (पर आपकी नजरों में बाकी बोर्ड के छात्र अगर एन्ट्रेस की कोचिंग कर बोर्ड में पास हो तो वे रेगुलर स्टूडेंट्स हो जाते और हम फर्जी) हमारे घरवालें भी हमारी पढ़ाई पर ध्यान देते है और रिजल्ट में हमारी मेहनत की छलक देखना चाहते हैं। हमारे भी सरकारी स्कूलों के हालात देश के बाकी सरकारी स्कूलों की तरह हैं (पर आपकी नजर में बिहार के अलावा देश के सारे सरकारी स्कूल शतप्रतिशत शिक्षक और छात्र उपस्थिति का सर्वोच्च नमूना है) माना हमारे यहाँ अच्छे कोचिंग सेंटर नहीं इसीलिए हम बाहर रहकर ऐंट्रेंस के साथ बोर्ड परीक्षा की तैयारी करते है लेकिन फिर भेदभाव हमारे साथ ही क्यों? क्या हमारे साथ दिल्ली और कोटा में कोचिंग करने वाले बाकी बोर्ड के छात्र रेगुलर होते हैं? नहीं, फिर आप उनकों देखने के लिए अलग चश्मा और हमें देखने के लिए अलग चश्मा क्यों रखें हैं?

              
मैं अब और ज्यादा नहीं बोलूंगी, नहीं तो क्या पता मुझसे तथाकथित कुछ क्रांतिकारियों की श्रेणी में रख मेरे साथ भी मानहानि का खेल खेलने लगें। दरसल असल बात तो यह है कि आप लोग आज भी पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था का गौरव रहे नालंदा की जमीन बिहार को पिछड़ा ही देखना चाहते है और जब वह आगे बढ़ने का प्रयास करता है तो उसकी खामियां गिनाकर खुद को उच्च और उसको तुच्छ साबित करने का प्रयास करतें है। 

            
अफसोस तो दरअसल तब सबसे ज्यादा होता है जब आपकी इस गैंग में खुद बिहार निवासी, बिहार बोर्ड के विधार्थी शामिल होते है। अपनी डिग्री को बचाने के लिए दुहाई देते है कि हमारे जमाने में तो बहुत कठिन पेपर आता था और बहुत कठाई भी होती थी लेकिन आजकल... और बस इसी 'आजकल' शब्द ने ही आधे से ज्यादा मेहनत करने वाले छात्रों की बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट पर सवाल खड़े कर दिये है।

                
बाकी आप लोगों को बहुत धन्यवाद की आप लोग हमकों कम से कम इतनी तवज्जो तो देते है फिर चाहे भले ही वह तवज्जो एक विशेष तरह का चश्मा लगाकर दिया जाता हो। 
                                                                                                                      आपकी बिहार टॉपर
                                                                                                                         
कल्पना कुमारी
 (यह पत्र कल्पना द्वारा नहीं लिखा गया है, बिहार की निवासी होने के कारण और कल्पना जैसे हजारों बिहार बोर्ड के छात्रों की परेशानी समझते हुए, मेरे (सुप्रिया सिंह) द्वारा लिखा गया यह पत्र